हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई

चौपाई ३, दोहा ५० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई॥ भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई॥ ३ ॥

अर्थ

संसार के सभी श्रमों को हरनेवाले प्रभु ने [हाथी, घोड़े आदि बाँटने में] श्रम का अनुभव किया और [श्रम मिटाने को] वहाँ गये जहाँ शीतल अमराई (आमों का बगीचा) थी। वहाँ भरतजी ने अपना वस्त्र बिछा दिया। प्रभु उस पर बैठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ और श्रीराम के मध्य गूढ़ आध्यात्मिक संवाद तथा भाइयों सहित अमराई भ्रमण का वर्णन है।

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राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण