सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित
चौपाई ४, दोहा ४९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥ दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई॥ ४ ॥
अर्थ
वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणों का घर और अखण्ड विज्ञानवान् है; वही चतुर और सब सुलक्षणों से युक्त है, जिसका आपके चरणकमलों में प्रेम है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ और श्रीराम के मध्य गूढ़ आध्यात्मिक संवाद तथा भाइयों सहित अमराई भ्रमण का वर्णन है।
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राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण