छूटइ मल कि मलहि के धोएँ

चौपाई ३, दोहा ४९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥ प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥ ३ ॥

अर्थ

मैल से धोने से क्या मैल छूटता है? जल के मथने से क्या कोई घी पा सकता है? [उसी प्रकार] हे रघुनाथजी! प्रेम-भक्तिरूपी [निर्मल] जल के बिना अन्तःकरण का मल कभी नहीं जाता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ और श्रीराम के मध्य गूढ़ आध्यात्मिक संवाद तथा भाइयों सहित अमराई भ्रमण का वर्णन है।

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राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण