जप तप नियम जोग निज धर्मा
जप तप नियम जोग निज धर्मा
चौपाई १, दोहा ४९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥ ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥ १ ॥
अर्थ
जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने [वर्णाश्रम के] धर्म, श्रुतियों से उत्पन्न (वेदविहित) बहुत-से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह), तीर्थ-स्नान आदि जहाँ तक वेद और संतजनों ने धर्म कहे हैं [उनके करने का]--।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ और श्रीराम के मध्य गूढ़ आध्यात्मिक संवाद तथा भाइयों सहित अमराई भ्रमण का वर्णन है।
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राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण