महिमा अमिति बेद नहिं जाना
महिमा अमिति बेद नहिं जाना
चौपाई ३, दोहा ४८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
महिमा अमिति बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥ उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥ ३ ॥
अर्थ
हे भगवन्! आपकी महिमा की सीमा नहीं है, उसे वेद भी नहीं जानते। फिर मैं किस प्रकार कह सकता हूँ? पुरोहिती का कर्म (पेशा) बहुत ही नीचा है। वेद, पुराण और स्मृति सभी इसकी निंदा करते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ और श्रीराम के मध्य गूढ़ आध्यात्मिक संवाद तथा भाइयों सहित अमराई भ्रमण का वर्णन है।
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राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण