मारुतसुत तब मारुत करई
मारुतसुत तब मारुत करई
चौपाई ४-५, दोहा ५० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥ हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी॥ गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई॥ ४-५ ॥
अर्थ
उस समय पवनपुत्र हनुमानजी पवन (पंखा) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया। [शिवजी कहने लगे--] हे गिरिजे! हनुमानजी के समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजी के चरणों का प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवा की [स्वयं] प्रभु ने अपने श्रीमुख से बार-बार बड़ाई की है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण” प्रकरण का चौपाई ४-५, दोहा ५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में गुरु वसिष्ठ और श्रीराम के मध्य गूढ़ आध्यात्मिक संवाद तथा भाइयों सहित अमराई भ्रमण का वर्णन है।
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राम-वसिष्ठ संवाद, अमराई भ्रमण