गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा

चौपाई ४, दोहा २१२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा॥ बरन बरन बिकसे बनजाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता॥ ४ ॥

अर्थ

मकरन्द-रस से मतवाले होकर भौंरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। रंग-बिरंगे [बहुत-से] पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं। रंग-रंग के कमल खिले हैं। सदा (सब ऋतुओं में) सुख देने वाला शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन बह रहा है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २१२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र, श्रीराम और लक्ष्मण के जनकपुर आगमन और मिथिला की अनुपम शोभा का वर्णन है।

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विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश