तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही
चौपाई ४, दोहा २०९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥ जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा॥ ४ ॥
अर्थ
तब ऋषि ने प्रभु को मन में पहचानकर विद्या का भण्डार समझते हुए भी [लीला को पूर्ण करने के लिये] ऐसी विद्या दी, जिससे भूख-प्यास न लगे और शरीर में अतुलित बल और तेज का प्रकाश हो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का राम-लक्ष्मण माँगना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र द्वारा यज्ञ-रक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को माँगने और दशरथ द्वारा वशिष्ठ की सम्मति से उन्हें भेजने का वर्णन है।
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विश्वामित्र का राम-लक्ष्मण माँगना