सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी

चौपाई ४, दोहा २०८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥ तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥ ४ ॥

अर्थ

प्रेम-रस में सनी हुई राजा की वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी ने हृदय में बड़ा हर्ष माना। तब वसिष्ठजी ने राजा को बहुत प्रकार से समझाया, जिससे राजा का सन्देह नाश को प्राप्त हुआ।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “विश्वामित्र का राम-लक्ष्मण माँगना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विश्वामित्र द्वारा यज्ञ-रक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को माँगने और दशरथ द्वारा वशिष्ठ की सम्मति से उन्हें भेजने का वर्णन है।

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विश्वामित्र का राम-लक्ष्मण माँगना