उपजहिं एक संग जग माहीं

चौपाई ३, दोहा ५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥ सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥ ३ ॥

अर्थ

दोनों (संत और असंत) जगत् में एक साथ पैदा होते हैं; पर [एक साथ पैदा होनेवाले] कमल और जोंक की तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। (कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है, किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है।) साधु अमृत के समान (मृत्युरूपी संसार से उबारनेवाला) और असाधु मदिरा के समान (मोह, प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करनेवाला) है, दोनों को उत्पन्न करने वाला जगद्रूपी अगाध समुद्र एक ही है। [शास्त्रों में समुद्रमन्थन से ही अमृत और मदिरा दोनों की उत्पत्ति बतायी गयी है]।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “खल वन्दना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा खलों की वन्दना और उनके स्वभाव का परिचय का वर्णन है।

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खल वन्दना