बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ

चौपाई १, दोहा ४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥ पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥ १ ॥

अर्थ

अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करने वाले के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों के हित की हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है, जिनको दूसरों के उजड़ने में हर्ष और बसने में विषाद होता है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “खल वन्दना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा खलों की वन्दना और उनके स्वभाव का परिचय का वर्णन है।

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खल वन्दना