पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना

चौपाई ५, दोहा ४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥ बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥ ५ ॥

अर्थ

पुनः उनको राजा पृथु के समान जानकर प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने भगवान् का यश सुनने के लिये दस हजार कान माँगे थे, जो दस हजार कानों से दूसरों के पापों को सुनते हैं। फिर इन्द्र के समान मानकर उनकी विनय करता हूँ, जिनको सदा देवताओं की सेना हितकारी मालूम देती है [इन्द्र के लिये भी सुरानीक अर्थात् देवताओं की सेना हितकारी है]।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “खल वन्दना” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा खलों की वन्दना और उनके स्वभाव का परिचय का वर्णन है।

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खल वन्दना