मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा

चौपाई १, दोहा ५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥ बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥ १ ॥

अर्थ

मैंने अपनी ओर से विनती की है, परन्तु वे अपनी ओर से कभी नहीं चूकेंगे। कौओं को बड़े प्रेम से पालिये; परन्तु वे क्या कभी मांस के त्यागी हो सकते हैं ?

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “खल वन्दना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा खलों की वन्दना और उनके स्वभाव का परिचय का वर्णन है।

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खल वन्दना