तेज कृसानु रोष महिषेसा
तेज कृसानु रोष महिषेसा
चौपाई ३, दोहा ४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥ उदय केत सम हित सब ही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥ ३ ॥
अर्थ
जो तेज (दूसरों को जलाने वाले ताप) में अग्नि और क्रोध में यमराज के समान हैं, पाप और अवगुणरूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभी के हित का नाश करने के लिये केतु (पुच्छल तारे) के समान है, और जिनके कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही भलाई है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “खल वन्दना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा खलों की वन्दना और उनके स्वभाव का परिचय का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
खल वन्दना