बंदउँ संत असज्जन चरना

चौपाई २, दोहा ५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥ २ ॥

अर्थ

अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वन्दना करता हूँ; दोनों ही दुःख देनेवाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अन्तर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं। (अर्थात्‌ संतों का बिछुड़ना मरने के समान दुःखदायी होता है और असंतों का मिलना)।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “खल वन्दना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा खलों की वन्दना और उनके स्वभाव का परिचय का वर्णन है।

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खल वन्दना