भल अनभल निज निज करतूती
भल अनभल निज निज करतूती
चौपाई ४-५, दोहा ५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥ गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥ ४-५ ॥
अर्थ
भले और बुरे अपनी-अपनी करतूती के अनुसार सुयश और अपयश की विभूति पाते हैं। सुधा, सुधाकर, सुरसरि और साधु; गरल, अनल, कलिमल-सरि और व्याध—इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं; किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “खल वन्दना” प्रकरण का चौपाई ४-५, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा खलों की वन्दना और उनके स्वभाव का परिचय का वर्णन है।
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खल वन्दना