हरि हर जस राकेस राहु से
चौपाई २, दोहा ४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥ जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥ २ ॥
अर्थ
जो हरि और हर के यशरूपी पूर्णिमाके चन्द्रमा के लिये राहु के समान हैं (अर्थात् जहाँ कहीं भगवान् विष्णु या शिव के यश का वर्णन होता है, उसमें वे बाधा देते हैं) और दूसरों की बुराई करने में सहस्रबाहु के समान वीर हैं। जो दूसरों के दोषों को हजार आँखों से देखते हैं और दूसरों के हितरूपी घी के लिये जिनका मन मक्खी के समान है (अर्थात् जिस प्रकार मक्खी घी में गिरकर उसे खराब कर देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरों के बने-बनाये काम को अपनी हानि करके भी बिगाड़ देते हैं)।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “खल वन्दना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में तुलसीदास द्वारा खलों की वन्दना और उनके स्वभाव का परिचय का वर्णन है।