जो अचवँत नृप मातहिं तेई
जो अचवँत नृप मातहिं तेई
चौपाई ४, दोहा २३१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई॥ सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा॥ ४ ॥
अर्थ
जिन्होंने साधुओं की सभा का सेवन (सत्संग) नहीं किया, वे ही राजा राजमदरूपी मदिरा का आचमन करते ही (पीते ही) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्ष्मण ! सुनो, भरत-सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्मा की सृष्टि में न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को शांत करके भरतजी के निष्कलुष प्रेम और धर्मनिष्ठा की महिमा का वर्णन है।
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राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा