मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई
चौपाई २, दोहा २३२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥ २ ॥
अर्थ
मच्छर की फूँक से चाहे सुमेरु उड़ जाय। परन्तु हे भाई ! भरत को राजमद कभी नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण ! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजी की सौगन्ध खाकर कहता हूँ, भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई संसार में नहीं है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को शांत करके भरतजी के निष्कलुष प्रेम और धर्मनिष्ठा की महिमा का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा