जौं न होत जग जनम भरत
जौं न होत जग जनम भरत
चौपाई १, दोहा २३३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को॥ कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा॥ १ ॥
अर्थ
यदि जग में भरत का जन्म न होता, तो पृथ्वी पर सम्पूर्ण धर्मों की धुरी को कौन धारण करता? हे रघुनाथजी! कवि-कुल के लिये अगम भरतजी के गुणों की कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को शांत करके भरतजी के निष्कलुष प्रेम और धर्मनिष्ठा की महिमा का वर्णन है।
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राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा