सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता
सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता
चौपाई ३, दोहा २३२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥ ३ ॥
अर्थ
हे तात! गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जल को मिलाकर विधाता इस दृश्य-प्रपञ्च (जगत्) को रचता है। परन्तु भरत ने सूर्यवंशरूपी तालाब में हंसरूप जन्म लेकर गुण और दोष का विभाग कर दिया (दोनों को अलग-अलग कर दिया)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को शांत करके भरतजी के निष्कलुष प्रेम और धर्मनिष्ठा की महिमा का वर्णन है।
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राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा