समुझि मातु करतब सकुचाहीं

चौपाई ४, दोहा २३३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं॥ रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ॥ ४ ॥

अर्थ

भरतजी अपनी माता कैकेयी की करनी को समझकर सकुचाते हैं और मन में करोड़ों कुतर्क करते हैं [सोचते हैं—] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर उठकर कहीं दूसरी जगह न चले जाएँ।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को शांत करके भरतजी के निष्कलुष प्रेम और धर्मनिष्ठा की महिमा का वर्णन है।

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राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा