तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई

चौपाई १, दोहा २३२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी॥ १ ॥

अर्थ

अन्धकार चाहे तरुण (मध्याह्नके) सूर्य को निगल जाय। आकाश चाहे बादलों में समाकर मिल जाय। गौ के खुर-इतने जल में अगस्त्यजी डूब जायँ और पृथ्वी चाहे अपनी स्वाभाविक क्षमा (सहनशीलता) को छोड़ दे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को शांत करके भरतजी के निष्कलुष प्रेम और धर्मनिष्ठा की महिमा का वर्णन है।

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राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा