भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि
दोहा २३१ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ। कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ॥ २३१ ॥
अर्थ
अयोध्या के राज्य की तो बात ही क्या है] ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का पद पाकर भी भरत को राज्य का मद नहीं होने का! क्या कभी काँजी की बूँदों से क्षीरसागर नष्ट हो सकता (फट सकता) है ?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा” प्रकरण का दोहा २३१ है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को शांत करके भरतजी के निष्कलुष प्रेम और धर्मनिष्ठा की महिमा का वर्णन है।
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राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा