गहि गुन पय तजि अवगुन बारी
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी
चौपाई ४, दोहा २३२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी॥ कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ॥ ४ ॥
अर्थ
गुणरूपी दूध को ग्रहण कर और अवगुणरूपी जल को त्यागकर भरत ने अपने यश से जगत् में उजियाला कर दिया है। भरतजी के गुण, शील और स्वभाव को कहते-कहते श्रीरघुनाथजी प्रेमसमुद्र में मग्न हो गये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को शांत करके भरतजी के निष्कलुष प्रेम और धर्मनिष्ठा की महिमा का वर्णन है।
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राम द्वारा लक्ष्मण को भरत की महिमा