रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि

सोरठा २१ (क) · अरण्यकाण्ड

सोरठा पाठ

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि। अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन॥ २१ (क) ॥

अर्थ

शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, प्रभु और सर्प को छोटा करके नहीं समझना चाहिये। ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगी।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा का रावण के पास जाना, माया सीता” प्रकरण का सोरठा २१ (क) है। इस प्रकरण में शूर्पणखा द्वारा रावण में दुराशा जगाना, सीता का अग्नि प्रवेश और माया सीता का प्राकट्य का वर्णन है।

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शूर्पणखा का रावण के पास जाना, माया सीता