करसि पान सोवसि दिनु राती

चौपाई ४-५, दोहा २१ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥ राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥ बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥ संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥ ४-५ ॥

अर्थ

शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है। तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिर पर खड़ा है ? राजनीति के बिना राज्य, धन के बिना धर्म, हरि को समर्पण किए बिना सत्कर्म, विद्या के बिना विवेक उत्पन्न किये जाने से और पढ़ने, किए जाने तथा पाने से श्रम का ही फल मिलता है। संग से जती, कुमंत्र से राजा, मान से ज्ञान, पान से लज्जा।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा का रावण के पास जाना, माया सीता” प्रकरण का चौपाई ४-५, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा द्वारा रावण में दुराशा जगाना, सीता का अग्नि प्रवेश और माया सीता का प्राकट्य का वर्णन है।

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शूर्पणखा का रावण के पास जाना, माया सीता