सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला
चौपाई १, दोहा २४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥ तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥ १ ॥
अर्थ
हे प्रिये! हे सुन्दर व्रतवाली, सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा। इसलिये जबतक मैं राक्षसों का नाश करूँ, तबतक तुम अग्नि में निवास करो।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “शूर्पणखा का रावण के पास जाना, माया सीता” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में शूर्पणखा द्वारा रावण में दुराशा जगाना, सीता का अग्नि प्रवेश और माया सीता का प्राकट्य का वर्णन है।
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शूर्पणखा का रावण के पास जाना, माया सीता