हेतु रहित जग जुग उपकारी
हेतु रहित जग जुग उपकारी
चौपाई ३, दोहा ४७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥ स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ
हे असुरों के शत्रु! जगत् में बिना हेतु के (निःस्वार्थ) उपकार करनेवाले तो दो ही हैं—एक आप, दूसरे आपके सेवक। जगत् में [शेष] सभी स्वार्थ के मीत हैं। हे प्रभो! उनमें स्वप्न में भी परमार्थ का भाव नहीं है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का प्रजा को उपदेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा प्रजा को धर्म, वैराग्य और भक्ति का उपदेश तथा पुरवासियों की कृतज्ञता का वर्णन है।
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राम का प्रजा को उपदेश