कहहु भगति पथ कवन प्रयासा
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा
चौपाई १, दोहा ४६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥ सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥ १ ॥
अर्थ
कहो तो, भक्तिमार्ग में कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योग की आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवास की! [यहाँ इतना ही आवश्यक है कि] सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसी में सदा संतोष रखे।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का प्रजा को उपदेश” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा प्रजा को धर्म, वैराग्य और भक्ति का उपदेश तथा पुरवासियों की कृतज्ञता का वर्णन है।
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राम का प्रजा को उपदेश