नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो
चौपाई ४, दोहा ४४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥ करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥ ४ ॥
अर्थ
यह मनुष्य का शरीर भवसागर [से तारने] के लिए बेड़ा (जहाज) है। मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। सद्गुरु इस मजबूत जहाज के कर्णधार (खेनेवाले) हैं। इस प्रकार दुर्लभ (कठिनता से मिलनेवाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपा से सहज ही) उसे प्राप्त हो गये हैं,
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का प्रजा को उपदेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा प्रजा को धर्म, वैराग्य और भक्ति का उपदेश तथा पुरवासियों की कृतज्ञता का वर्णन है।
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राम का प्रजा को उपदेश