प्रीति सदा सज्जन संसर्गा

चौपाई ४, दोहा ४६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥ भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई॥ ४ ॥

अर्थ

जिसे सदा सज्जनों के संसर्ग से प्रीति है, जिसके मन में सब विषय, यहाँ तक कि स्वर्ग और अपवर्ग भी [भक्ति के सामने] तृण के समान हैं, जो भक्ति के पक्ष में हठ करता है, पर [दूसरे के मत का खण्डन करने की] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब दुष्ट तर्कों को दूर बहा दिया है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का प्रजा को उपदेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा प्रजा को धर्म, वैराग्य और भक्ति का उपदेश तथा पुरवासियों की कृतज्ञता का वर्णन है।

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राम का प्रजा को उपदेश