भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी

चौपाई ३, दोहा ४५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥ पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥ ३ ॥

अर्थ

भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखों की खान है। परन्तु सतसंग (संतों के संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते। और पुण्य-समूह के बिना संत नहीं मिलते। सतसंगति ही संसृति (जन्म-मरण के चक्र) का अन्त करती है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का प्रजा को उपदेश” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा प्रजा को धर्म, वैराग्य और भक्ति का उपदेश तथा पुरवासियों की कृतज्ञता का वर्णन है।

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राम का प्रजा को उपदेश