पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा

चौपाई ४, दोहा ४५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥ सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥ ४ ॥

अर्थ

जगत् में पुण्य एक ही है, [उसके समान] दूसरा नहीं। वह है--मन, कर्म और वचन से ब्राह्मणों के चरणों की पूजा करना। जो कपट का त्याग करके ब्राह्मणों की सेवा करता है, उस पर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का प्रजा को उपदेश” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा प्रजा को धर्म, वैराग्य और भक्ति का उपदेश तथा पुरवासियों की कृतज्ञता का वर्णन है।

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राम का प्रजा को उपदेश