तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए
चौपाई २, दोहा ११ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥ ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला। तेहि आसन आसीन कृपाला॥ २ ॥
अर्थ
वहाँ लक्ष्मणजी ने वृक्षों के कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथों से सजाकर बिछा दिये। उस पर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी। उसी आसन पर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “सुबेल पर राम की झाँकी, चंद्रोदय” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुबेल पर्वत पर श्रीराम की मनोहर झाँकी और चंद्रोदय की अलौकिक शोभा का वर्णन है।
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सुबेल पर राम की झाँकी, चंद्रोदय