बिथुरे नभ मुकुताहल तारा
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा
चौपाई २, दोहा १२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा॥ कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई॥ २ ॥
अर्थ
आकाश में बिखरे हुए तारे मोतियों के समान हैं, जो रात्रि-रूपी सुन्दर स्त्री के श्रृंगार हैं। प्रभु ने कहा- भाइयो ! चन्द्रमा में जो कालापन है वह क्या है ? अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार कहो।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “सुबेल पर राम की झाँकी, चंद्रोदय” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुबेल पर्वत पर श्रीराम की मनोहर झाँकी और चंद्रोदय की अलौकिक शोभा का वर्णन है।
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सुबेल पर राम की झाँकी, चंद्रोदय