जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन
जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन
छन्द, दोहा १०४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं। जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं॥ आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं। तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं॥
अर्थ
दैत्यरूपी वन को जलाने के लिये अग्निस्वरूप साक्षात् श्रीहरि को तुमने मनुष्य करके जाना। शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान् को हे प्रियतम! तुमने नहीं भजा। आजन्म से परद्रोहरत पापौघमय तुम्हारा यह तन रहा! इतने पर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजी ने तुम्हें अपना धाम दिया, उनको मैं नमस्कार करती हूँ॥।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि” प्रकरण का छन्द, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मन्दोदरी के विलाप और विभीषण द्वारा रावण की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन है।
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मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि