तव बल नाथ डोल नित धरनी

चौपाई ३, दोहा १०४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥ सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा॥ ३ ॥

अर्थ

हे नाथ! तुम्हारे बल से पृथ्वी सदा काँपती रहती थी। अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे। शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूल में भरा हुआ पृथ्वी पर पड़ा है!।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मन्दोदरी के विलाप और विभीषण द्वारा रावण की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन है।

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मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि