तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा
चौपाई ६, दोहा १०४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा॥ अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं॥ ६ ॥
अर्थ
हे नाथ! विधाता की सारी सृष्टि तुम्हारे वश में थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे। किन्तु हाय! अब तुम्हारे सिर और भुजाओं को गीदड़ खा रहे हैं। रामविमुख के लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है (अर्थात् उचित ही है)।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मन्दोदरी के विलाप और विभीषण द्वारा रावण की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि