भरि लोचन रघुपतिहि निहारी

चौपाई २, दोहा १०५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी॥ रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी॥ २ ॥

अर्थ

वे सभी श्रीरघुनाथजी को नेत्र भरकर निरखकर प्रेम मगन हो गये और अत्यन्त सुखी हुए। अपने घर की सब स्त्रियों को रोती हुई देखकर विभीषणजी के मन में बड़ा भारी दुःख हुआ और वे उनके पास गये।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मन्दोदरी के विलाप और विभीषण द्वारा रावण की अन्त्येष्टि क्रिया का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि