उर लात घात प्रचंड लागत बिकल

छन्द, दोहा ९८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा। गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा॥ मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयो। निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो॥

अर्थ

छाती में लात का प्रचण्ड आघात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथ से पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसने बीसों हाथों में भालुओं को पकड़ रखा था। [ऐसा जान पड़ता था] मानो रात्रि के समय भौरे कमलों में बसे हुए हों। उसे मूर्छित देखकर, फिर लात मारकर ऋक्षराज जामवंत प्रभु के पास चले गये। रात्रि जानकर सारथि रावण को रथ में डालकर उसे होश में लाने का उपाय करने लगा॥

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “घोर युद्ध, रावण की मूर्छा” प्रकरण का छन्द, दोहा ९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में घोर युद्ध में राम के प्रहारों से रावण की मूर्छा और वानर वीरों के पराक्रम का वर्णन है।

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घोर युद्ध, रावण की मूर्छा