सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी

चौपाई १, दोहा ९८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी॥ मरत न मूढ़ कटेहुँ भुज सीसा। धाए कोपि भालु भट कीसा॥ १ ॥

अर्थ

शत्रु के सिर और भुजाओं की बढ़ती देखकर रीछ-वानरों को बहुत ही क्रोध हुआ। यह मूर्ख भुजाओं के और सिरों के कटने पर भी नहीं मरता, [ऐसा कहते हुए] भालू और वानर योद्धा क्रोध करके दौड़े।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “घोर युद्ध, रावण की मूर्छा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में घोर युद्ध में राम के प्रहारों से रावण की मूर्छा और वानर वीरों के पराक्रम का वर्णन है।

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घोर युद्ध, रावण की मूर्छा