रुधिर देखि बिषाद उर भारी

चौपाई ४, दोहा ९८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

रुधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी॥ गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं॥ ४ ॥

अर्थ

रक्त देखकर उसके हृदय में बड़ा विषाद हुआ। उसने उनको पकड़ने के लिये भुजाएँ फैलाईं, पर वे पकड़ में नहीं आते, हाथों के ऊपर-ऊपर ही फिरते हैं, मानो दो भौरे कमलों के वन में विचरण कर रहे हों।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “घोर युद्ध, रावण की मूर्छा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में घोर युद्ध में राम के प्रहारों से रावण की मूर्छा और वानर वीरों के पराक्रम का वर्णन है।

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घोर युद्ध, रावण की मूर्छा