बिकल बिलोकि कीस उर लावा
बिकल बिलोकि कीस उर लावा
चौपाई २, दोहा ५९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥ मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥ २ ॥
अर्थ
हनुमानजी को व्याकुल देखकर उन्होंने हृदय से लगा लिया। बहुत तरह से जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजी का मुख उदास हो गया। वे मन में बड़े दुखी हुए और नेत्रों में [विषाद के आँसुओं का] जल भरकर ये वचन बोले--।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में औषधि लेकर लौटते हनुमान पर भरत के बाण का प्रहार और उनके बीच भावपूर्ण मिलन-संवाद का वर्णन है।
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भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद