सुनि कपि मन उपजा अभिमाना
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना
चौपाई ४, दोहा ६० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥ ४ ॥
अर्थ
भरतजी की यह बात सुनकर [एक बार तो] हनुमानजी के मन में अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा? [किन्तु] फिर श्रीरामचन्द्रजी के प्रभाव का विचार करके वे भरतजी के चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले--।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में औषधि लेकर लौटते हनुमान पर भरत के बाण का प्रहार और उनके बीच भावपूर्ण मिलन-संवाद का वर्णन है।
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भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद