तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला
चौपाई ४, दोहा ५९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥ सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥ ४ ॥
अर्थ
और यदि श्रीरघुनाथजी मुझपर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय! यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमानजी 'कोसलपति श्रीरामचन्द्रजी की जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में औषधि लेकर लौटते हनुमान पर भरत के बाण का प्रहार और उनके बीच भावपूर्ण मिलन-संवाद का वर्णन है।
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भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद