देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन

दोहा ५८ · लंकाकाण्ड

दोहा पाठ

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि। बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥ ५८ ॥

अर्थ

भरतजी ने आकाश में अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मन में अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कान तक धनुष को खींचकर बिना फल का एक बाण मारा।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद” प्रकरण का दोहा ५८ है। इस प्रकरण में औषधि लेकर लौटते हनुमान पर भरत के बाण का प्रहार और उनके बीच भावपूर्ण मिलन-संवाद का वर्णन है।

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भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद