जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा

चौपाई ३, दोहा ५९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥ जौं मोरें मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया॥ ३ ॥

अर्थ

जिस विधाता ने मुझे श्रीराम से विमुख किया, उसी ने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और काया से श्रीरामजी के चरणकमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो,

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में औषधि लेकर लौटते हनुमान पर भरत के बाण का प्रहार और उनके बीच भावपूर्ण मिलन-संवाद का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत का बाण, हनुमान-भरत संवाद