लखि सुबेष जग बंचक जेऊ
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ
चौपाई ३, दोहा ७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥ ३ ॥
अर्थ
जो [वेषधारी] ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधु का-सा) वेष बनाया देखकर वेष के प्रताप से जगत् पूजता है; परन्तु एक-न-एक दिन वे उघड़ ही आते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “संत असंत वन्दना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संत और असंत के स्वभाव तथा गुण-दोष के भेद का सूक्ष्म विवेचन का वर्णन है।
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संत असंत वन्दना