गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा
चौपाई ५, दोहा ७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥ साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥ ५ ॥
अर्थ
पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचे की ओर बहने वाले) जल के संग से कीचड़ में मिल जाती है। साधु के घर के तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “संत असंत वन्दना” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में संत और असंत के स्वभाव तथा गुण-दोष के भेद का सूक्ष्म विवेचन का वर्णन है।
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संत असंत वन्दना